Sunday, 6 January 2019
बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया beech mei parda dui ka tha
बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया
ऐसा कुछ देखा के दुनिया से मेरा दिल उठ गया
शमा ने रो-रो के काटी रात सूली पर तमाम
शब को जो महफ़िल से तेरी ऐ ज़ेब-ए-महफ़िल उठ गया
मेरी आँखों में समाया उस का ऐसा नूर-ए-हक़
शौक़-ए-नज़्ज़ारा ऐ बद्र-ए-कामिल उठ गया
ऐ ज़फ़र क्या पूछता है बेगुनाह-ओ-बर-गुनह
उठ गया अब जिधर को वास्ते क़ातिल उठ गया
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