Friday, 4 January 2019
तिरा रूख़ देख कर जल जाए जल में, tira rookh dekh jal jaaye jal mei
तिरा रूख़ देख कर जल जाए जल में
कहाँ ये रंग ये ख़ूबी कँवल में
हुआ वीराँ नगर मेरी ख़िरद का
जुनूँ की सूबे-दारी के अमल में
कमर बाँधे अगर आशिक़-कुशी पर
करे क़त्ल-ए-दो-आलम एक पल में
अजब उस यूसुफ़-ए-मिस्री के हैं लब
नहीं हरगिज़ वो शीरीनी असल में
जिगर के दाग़ सीं फूले है लाला
तमाशा देख आ दिल के महल में
हुआ शेर-ए-सिराज अज़-बस-के रंगीं
लताफ़त गुल की है हर यक ग़ज़ल में
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