Friday, 4 January 2019
तुझ रूख़ का रंग देख ख़जिल है चमन में गुल, tujh rookh ka rang dekh khajil
तुझ रूख़ का रंग देख ख़जिल है चमन में गुल
जलता है सोज़-ए-रश्क सीं हर फूलबन में गुल
वो शोख़ गुल-एज़ार हुआ जब सीं जलवा-गर
है बे-विकार तब सीं हर इक अंजुमन में गुल
मुझ दाग़-ए-दिल के रश्क सती झड़ गए हैं सब
हरगिज़ नहीं रहा है बहिश्त-ए-अदन में गुल
उस गुल-बदन की याद में जो कोई कि जी दिया
तकफ़ीं के वक्त चाहिए उस के कफ़न में गुल
आता है जब ख़याल-ए-हम-आग़ोशी-ए-सनम
सिलता है मिस्ल-ए-ख़ार मिरे पैरहन में गुल
है अंदलीब-ए-दिल कूँ वो गुल-रू की आरज़ू
ज़ाहिर है जिस की ज़ुल्फ़ की हर हर शिकन में गुल
सैर-ए-चमन का ज़ौक़ मुझे कब है ऐ ‘सिराज’
हर बैत-ए-ताज़ा है मिरे बाग़-ए-सुख़न में गुल
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