Wednesday, 2 January 2019
जावक के भार पग धरा पै मंद, jaavak ke bhar pag
जावक के भार पग धरा पै मंद,
गंध भार कचन परी हैं छूटि अलकैं।
द्विजदेव तैसियै विचित्र बरूनी के भार,
आधे-आदे दृगन परी हैं अध पलकैं॥
ऐसी छबि देखी अंग-अंग की अपार,
बार-बार लोल लोचन सु कौन के न ललकैं।
पानिप के भारन संभारति न गात लंक,
लचि-लचि जात कुच भारन के हलकैं॥
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