विष में अमृत होत है, भगवत वर परसाद । दुश्मन मित्तरवत सबी, तपवत् सब परमाद ।। तपवत् सब परमाद दया भगवत की जिनपै । सागर गो-पद-तुल्य राम राजी जिन किन पै ।। गंगादास कहें समझ वेद ज्ञापक हैं इसमें । मीरा को हो गया महा अमृत रस विष में ।।
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