Saturday, 1 December 2018
ब्राह्मण न जानते भेद। यों ही पढ़े ये चारो वेद।
ब्राह्मण न जानते भेद। यों ही पढ़े ये चारो वेद।
मट्टी पानी कुश लेइ पढ़ंत। घरही बइठी अग्नि होमंत।
काज बिना ही हुतवह होमें। आँख जलावें कड़घए धूएँ।
एकदंडी त्रिदंडी भगवा भेसे। ज्ञानी होके हंस उपदेशे।
मिथ्येहि जग बहा भूलैं। धर्म अधर्म न जाना तुल्यैं।
शैव साधु लपेटे राखी। ढोते जटा भार ये माथी।
घर में बैठे दीवा बालैं। कोने बैठे घंटा चालैं।
आँख लगाये आसन बाँधे। कानहिं खुसखुसाय जन मूढ़े।
रंडी मुंडी अन्यहु भेसे। दीख पड़त दक्षिना उदेसे।
दीर्घनखी यति मलिने भेसे। नंगे होइ उपाड़े केशे।
क्षपणक ज्ञान विडंबित भेसे। आतम बाहर मोक्ष उदेसे।
मट्टी पानी कुश लेइ पढ़ंत। घरही बइठी अग्नि होमंत।
काज बिना ही हुतवह होमें। आँख जलावें कड़घए धूएँ।
एकदंडी त्रिदंडी भगवा भेसे। ज्ञानी होके हंस उपदेशे।
मिथ्येहि जग बहा भूलैं। धर्म अधर्म न जाना तुल्यैं।
शैव साधु लपेटे राखी। ढोते जटा भार ये माथी।
घर में बैठे दीवा बालैं। कोने बैठे घंटा चालैं।
आँख लगाये आसन बाँधे। कानहिं खुसखुसाय जन मूढ़े।
रंडी मुंडी अन्यहु भेसे। दीख पड़त दक्षिना उदेसे।
दीर्घनखी यति मलिने भेसे। नंगे होइ उपाड़े केशे।
क्षपणक ज्ञान विडंबित भेसे। आतम बाहर मोक्ष उदेसे।
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