कै बिधि कँचनगार सिंगार कै दीने बनाय अनूपम रंग के । कै कदली उलटी ह्वै विराजत कै करि शुँड दिखात उमँग के । ऐसी लसैँ उपमा तिनकी द्विज भाषत है इमि पाय प्रसंग के । प्राण प्रिया के सुराजत ये दोऊ जँग किधौँ हैँ निषँग अनँग के ।
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