Thursday, 3 January 2019
फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखो masihai ka davaa dekho
फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखो
मुझको देखो मेरे मरने की तमन्ना देखो
जुर्मे-नज़्ज़ारा पे कौन इतनी ख़ुशामद करता
अब भी वो रूठे हैं लो और तमाशा देखो
दो ही दिन में है न वो बात , न वो चाह, न प्यार
हम ने पहले ही ये तुम से न कहा था देखो
हम न कहते थे बनावट से है सारा ग़ुस्सा
हँस के लो फिर वो उन्होंने हमें देखा देखो
मस्ती-ए-हुस्न से अपनी भी नहीं तुम को ख़बर
क्या सुनो अर्ज़ मेरी हाल मेरा क्या देखो
घर से हर वक़्त निकल आते हो खोले हुए बाल
शाम देखो न मेरी जान सवेरा देखो
ख़ाना-ए-जाँ में नुमुदार है इक पैकर-ए-नूर
हसरतो आओ, रुख़े-यार का जल्वा देखो
सामने सबके मुनासिब नहीं हम पर ये इताब
सर से ढल जाए न ग़ुस्से में दुपट्टा देखो
मर मिटे हम तो कभी याद भी तुमने न किया
अब महब्बत का न करना कभी दावा देखो
दोस्तो तर्के-महब्बत की नसीहत है फ़ज़ूल
और न मानो तो दिले-यार को समझा देखो
सर कहीं बाल कहीं हाथ कहीं पाँव कहीं
उसका सोना भी है किस शान का सोना देखो
अब तो शोख़ी से वो कहते हैं सितमगर हैं जो हम
दिल किसी और से कुछ रोज़ ही बहला देखो
हवस-ए-दीद मिटी है न मिटेगी ‘हसरत’
देखने के लिए चाहो उन्हें जितना देखो
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