Thursday, 3 January 2019

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं bhulata lakh hu lekin

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भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्के-उल्फ़त पर वो क्योंकर याद आते हैं

न छेड़ ऐ हम नशीं कैफ़ीयते-सहबा  के अफ़साने
शराबे-बेख़ुदी  के मुझको साग़र याद आते हैं

रहा करते हैं क़ैद-ए-होश  में ऐ वाये नाकामी
वो दश्ते-ख़ुद फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं

नहीं आती तो याद उनकी महीनों भर नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं

हक़ीक़त खुल गई ‘हसरत’ तेरे तर्के-महब्बत की
तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं


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