Thursday, 3 January 2019
वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कही vasl ki banti hai in baato se
वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं
आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरें कहीं
बेज़बानी तर्जुमाने-शौक़े-बेहद हो न हो
वर्ना पेशे-यार काम आती हैं तक़रीरें कहीं
मिट रही हैं दिल से यादें रोज़गारे-ऐश की
अब नज़र काहे को आयेंगी ये तस्वीरें कहीं
इल्तिफ़ात-ए-यार था इक ख़्वाब-ए-आग़ाज़े-वफ़ा
सच हुआ करती हैं इन ख़्वाबों की ताबीरें कहीं
तेरी बेसब्री है ‘हसरत’ ख़ामकारी की दलील
गिरिया-ए-उश्शाक़ में होती हैं तासीरें कहीं
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