Thursday, 3 January 2019

याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़े, yaad hai saare aish ae ba fargat

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याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़े
दिल अभी भूला नहीं आग़ाज़-उल्फ़त के मज़े

वो सरापा नाज़ था बेग़ाना-ए-रस्म-ए-जफ़ा
और मुझे हासिल थे लुत्फ़े-बे-निहायत  के मज़े

हुस्न से अपने वो ग़ाफ़िल था, मैं अपने इश्क़ से
अब कहाँ से लाऊँ वो नावाक़फ़ीयत के मज़े

मेरी जानिब से निगाहे शौक़ की बेताबियाँ
यार की जानिब से आग़ाज़े-शरारत के मज़े

याद हैं वो हुस्नो-ओ-उल्फ़त की निराली शोख़ियाँ
इल्तमास-ए-उज़्र-ओ-तमहीद-ए-शिकायत के मज़े

सेहतें लाखों मेरी बीमारी-ए-ग़म  पर निसार
जिस में उठ्ठे बारहा उनकी अयादत के मज़े


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