Thursday, 3 January 2019

मस्ती के फिर आ गये ज़माने masti ke fir aa gaye jamane

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मस्ती के फिर आ गये ज़माने
आबाद हुए शराबख़ाने

हर फूल चमन में ज़र-ब-कफ़ है
बाँटे हैं बहार ने ख़ज़ाने

सब हँस पड़े खिलखिला के ग़ुंचे
छेड़ा जो लतीफ़ा सबा ने

सरसब्ज़ हुआ निहाले-ग़म भी
पैदा वो असर किया हवा ने

रिन्दों ने पिछाड़कर पिला दी
वाइज़ के न चल सके बहाने

कर दूँगा मैं हर वली को मयख़्वार
तौफ़ीक़ जो दी मुझे ख़ुदा ने

हमने तो निसार कर दिया दिल
अब जाने वो शोख़, या न जाने

बेग़ाना-ए-मय किया है मुझको
साक़ी की निगाहे -आश्ना ने

मसकन है क़फ़स में बुलबुलों का
वीराँ पड़े हैं आशियाने

अब काहे को आएँगे वो ‘हसरत’
आग़ाज़े-जुनूँ के फिर ज़माने


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