Monday, 3 December 2018

दोहे शेख फरीद के Dohe Sheikh Farid 161-200

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फ़रीदा दाड़्हियां लख वतन्न हभि ना हिक्के जेहियां ॥
इक दर लख लहन हिकु कखों कन्नउ हउलियां ॥162॥


फ़रीदा दुख सुखु इकु करि न दिल ते लाह विकारु ॥
अलहु भावै सो भला तां लभी दरबार ॥163॥


फ़रीदा दुनी दे लालच लग्या मेहनत भुल गई ॥
जा सिर आई आपने तां सभो विसर गई ॥164॥


फ़रीदा देह जहसरि भई, नैनी वहै सरेस ॥
सै कोहां मंजा भया अंङन थिया बिदेश ॥165॥


फ़रीदा देखि जु सज्जन अहु गए चड़ि चन्दन की नाउं ॥
मनि पछतावा रह गया, दउड़ि न चुंमे पाउं ॥166॥


फ़रीदा देखि जि सज्जन आहु गए, मैंडनि मैला वेसु ॥
नसो आवनु न मिलन, वंञ लथे वह देस ॥167॥


फ़रीदा दिल अन्दर दर्याउ कंधी लगा की फिरैं ॥
टुबी मार मंझाही रीझों ही मानक लहैं ॥168॥


फ़रीदा दिल दी तोड़ तकब्बरी मन दी लाह भरांदि ॥
दरवेसा कू लोड़ीऐ रुखां दी जीरांदि ॥169॥


फ़रीदा निकड़ी जेहीऐ जंङड़ीऐ हभे जग भव्योम ॥
विच मसीती कूजड़ा सउ कोहा थीयोम ॥170॥


फ़रीदा नेहु त लब केहा लब ता कूड़ा नेहु ॥
किचर तांईं रखीऐ तुटे झूम्बर मेहु ॥171॥


फ़रीदा पहु फुटी झालू थियां, हभ वेहानी राति ॥
ऐथे अमल करेंदीए, देसी कउन जगाति ॥172॥



फ़रीदा पाउ पसार के अट्ठे पहर ही सउं ॥
लेखा कोयी न पुछई, जे विचहुं जावी हउं ॥173॥


फ़रीदा पिती विसारन ब्यार वण कबुध चवैनि ॥
कंचन्न रास विसार कर मुठी धूड़ भरेनि ॥174॥


फ़रीदा पैरी बेड़ा ठेल के कंढे खड़ा न होउ ॥
वतन आवन थीसिया एत न निन्दड़ी सोउ ॥175॥


फ़रीदा पैरीं कंडे पंधड़ा, सेती सुजाना ॥
भट्ठ हिंडोलह दा पींघणा, सेती अजाना ॥176॥


फ़रीदा फटिया लख मिलिनि फटी लिखे न काय ॥
फटी नूं फटी मिलै तां देवै दर बताय ॥177॥


फ़रीदा बेड़ा ज़रजरा, कम्बन लगा जीउ ॥
जे तुझ पार लंघावणा, तां आपि मुहाना थीउ ॥178॥


फ़रीदा भुख न लावन मंगिया इशक न पुछी जाति ॥
नींद न सथर मंगिया किवें बेहानी राति ॥179॥


फ़रीदा मंझ दरवाजे वैहद्या डिठम मैं ढड़्याल ॥
गलहु जंजीर न उतरे चोट सहे कपाल ॥
बेगुनाहां एह मारीऐ गुनाहा दा क्या हाल ॥180॥


फ़रीदा मंझि मक्का मंझि माड़ींआ, मंझे ही मेहराब ॥
मंझे ही काबा थिया कैदे करी निवाज़ ॥181॥


फ़रीदा मलक दीया अक्खीं गदियां बिजू लवै चमकार ॥
तिन्ना को नीदड़ी कयूं पवे जिन्हां मलक जेहे जन्दार ॥182॥


फ़रीदा मानक मोल अथाहु, कदर की जानह सीसगर ॥
इके त गूड़्हा शाह, इके तां जानह जउहरी ॥183॥


फ़रीदा मिठा बोलन निव चलन हैथहु भी कछु देन ॥
रब्ब तिनां दी बुकली जंगल क्युं ढूंढेन ॥184॥


फ़रीदा मृत(मित्र) विछोड़ा ब्रेह झल न बूझे गवार ॥
क्या जाणनि अव्यारा बूला सन्दी सार ॥185॥


फ़रीदा मिरशी अते आसकी बाली मीझु न होइ ॥
जे जन रते रब सयूं तिन तनि रतु न कोइ ॥186॥


फ़रीदा मैं नूं मुंज करि, निक्की करि करि कुट्टि ॥
भरे खज़ाने रब्ब दे जो भावह सो लुट्टि ॥187॥


फ़रीदा मैं तन अउगन एतड़े, जेते धरती कक्खु ॥
तउं जेहा मैं न लहां, मैं जेहियां कई लक्ख ॥188॥


फ़रीदा रातीं अते डेह वंञनि विदा करेद्यां ॥
इह भि कूड़ा नेहु, रब जागह तूं पै सवहं ॥189॥


फ़रीदा राती सोवह खट्ट, डीहे पिटहं पेट कूं ॥
जा तउं खट्टन वेल, तडाहीं ते सउं रहआ ॥190॥


फ़रीदा राती चार पहर तू सुता कूं जाग ॥
घना सोवसी गोर मह लहसिया इहु विरागु ॥191॥


फ़रीदा रोटी तेरी काठ की लावन तैडी भुक्ख ॥
जो खावसनि चोपड़ी घने लहसनि डुख ॥192॥


फ़रीदा होवन जलन निवार, न करि अखीं गाढीयां ॥
लंमी नदरि नेहाल, सभो जग ही वांढड़ा ॥193॥


फ़रीदा लहरी सायर सन्दियां, भी सो हंस तरैनि ॥
क्या तरेनि बगबपुड़े जि पहली लहर डुबन्नि(डुबैनि) ॥194॥


फ़रीदा वडी इह बहादुरी, करि कूगंग कोत्यासु ॥
दरगाह थीवी मुखि उजला कोइ न लगी दाग ॥195॥


फ़रीदा वड वेर ना जाग्यो जीवन्दा मुइयोइ ॥
जे तै रब विसार्या तूं रब ना विसारयोइ ॥196॥


फ़रीदा विछोड़ा बुर्यारु जिति विछड़े जग दुबला ॥
ते माहनु हैस्यार विछुड़ि के मोटे थीवन ॥197॥


बाजे बज्जे मउत दे सगल जहान सुने ॥
पीर पिकम्बर अउलीए से भी मउत चुने ॥
खाकां विच घड़ीसनी, पानी पीन पुनै ॥
लिखी मुहलति चलणा, फ़रीदा ज्युं ज्युं पए गुनै ॥198॥


बाजे बजे मौति दे चड़या मलकअुल मौतु ॥
घिनन वाहीं जयन्दुड़ी ढाहन वाहें कोट ॥199॥


बिना गुर निस दिन फिरां नी माए, पिर के हावे ॥
अउगण्यारी नूं क्युं कर कंत वसावे ॥200॥


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