Monday, 3 December 2018
दोहे शेख फरीद के, Dohe sheikh farid 21-40
सुखा झूखां धधलां तिनां दिती झोक ॥
जा सिरि आई आपने तां मजां किते न लोक ॥21॥
सुख डुखाहुं अगले जे गिरली धीरे ॥
सुखां लायक त थीवह जां डुख कबूल करे ॥22॥
सेख फरीद कहे कलि मै मिठा पीव ॥
इक मुवा अरु जालि मै को नूं रखां जीव ॥23॥
सैख फरीद तवकली मालिन धरो पिजार ॥
तले बिछावै कंकरे सेवै सालिक दुआर ॥24॥
हथड़ी वटे हथड़े पैरां वट्टे पैर ॥
तुसां न मुतिया गाजरां असां न मुते बेर ॥25॥
जिती खुसियां कीतियां तिती थियम रोगु ॥
छिलु कारनि मारीऐ खाधै दा कि होगु ?26॥
इह तन रता देख करि, तिलियर ठूंग न मारि ॥
जो रते रबे आपणे, तिन तनि रतु न भाल ॥27॥
फरीदा मिरागीं अते आशकी, बाली मीझु न होइ ॥
जो जन रते रब स्युं, तिन मनि रतु न कोइ ॥28॥
इह दिल अजब किताब, जिथे दूजा हरफ न लिखीऐ ॥
फरीदा सो दम कित हिसाब, जो दम साईं विसारह ॥29॥
कहां करउं प्रीतम बिना कलप बिरछ दी छाउ ॥
ग्रीखम ढक सहेलहउ जो प्रीतम रल बाहु ॥30॥
काग कलूली करि गए बग बैठे सिर मलि ॥
संभिलि घिनु फरीद तूं वंञनु अज कि कलि ॥31॥
कंचन रास विसारि कर, मुठी धूड़ भरेनि ॥
फरीदा तूं तूं करेदे जो मुए भी तूं तूं करेनि ॥32॥
कंतु नेहु तनि गारुड़ी, नागां हथि मनाय ॥
विस गन्दली मसदह नगर, होरीं लहुद लहाय ॥33॥
कनक मोल कागद भया अरु मसु भई हीरे मोल ॥
लिखनी भई जु लिख थके ए दोउ पिय के बोल ॥34॥
कनत नेह तनि गारड़ी, नागां हथि मनाय ॥
विस गन्दली मसदह नगर, होरी लहदु लुहाय ॥35॥
कन्नां दन्दां अखियां सभना दिती हार ॥
वेख फरीदा छड गए मुढ कदीमी यार ॥36॥
कर कम्पै लिखनी गिरै रोम रोम अकुलाय ॥
सुघि आए छातीं जलै पतिया लिखी न जाय ॥37॥
कागां नैन निकास दूं, पी के दुख ले जाय ॥
फरीदा पहले दरस दिखाए के ता के पाछे खाय ॥38॥
तुम हम को क्युं विसार्यु इह भली न रीति ॥
क्या तुम लिखु नहीं जानते कि मनहु विसारी प्रीति ॥39॥
कागै आइ ढंडोल्या, पाय मुट्ठ कु हड्ड ॥
जिन पिंजर ब्रेहा बसै मास कहां ते रत ॥40॥
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