Monday, 3 December 2018
दोहे शेख फरीद के Dohe shekh farid 1-20
उठ फरीदा सुत्या दुनियां वेखन जाह ॥
मत कोयी बखश्या होवयी तूं वी बखश्या जाह ॥1॥
उठ फरीदा सुत्या मन दा दीवा बाल ॥
साहब जेहनां दे जागदे नफर की सोवन नाल ॥2॥
अखीं लख पसन्नि रूह न राज़ी कहीं स्युं ॥
मैंडियां सिकां सभ पुजनि जां मुक्ख देखां सज्जना ॥3॥
अज कि कल कि चहुं देहीं मलकु असाडी हेर ॥
के जिता के हारआयो सओदा एहा वेर ॥4॥
अभड़-वंजै उठ के, लगह धए जाए ॥
देख फरीदा जि थिया, झुरना गया वेहाय ॥5॥
आसरा धनी मलाहु कोयी ना लाह हो कडही ॥
विइउं दाज अथाह वर्याने सचा धनी ॥6॥
असा तुसाडी सजणों अट्ठो पहर समाल ॥
डीहें वसो मने मे राती सुपने नाल ॥7॥
अहन पवे भावे मेहु सिर ही उपर झल्लना ॥
तिकन कासा काठ दा वासा विच वना ॥
फरीदा बारी अन्दर जालना दरवेसा हरना ॥8॥
आख फरीदा की करां हुन वखत वेहाना ॥
ओड़क वेला वेख के बहु पछोताना ॥9॥
आवो लधो साथड़ो ऐवे वनज करीं ॥
मूल संभालीं आपना पाछे लाहा लईं ॥10॥
मंग साहब चंगा गुनी देहन्दा, कहै फरीद सुणावै ॥
बिन गुर निसदिन फिरां नी माए, पिर कै हावै ॥11॥
सकर खंड निवात गुड़ माख्युं माझा दुध ॥
मिठड़ियां हभे वसतूआं सांयी न पुजन तुध ॥12॥
सचा सांयी सच प्यारा तामूं कूड़ न खेली ॥
जंगल विचि बसेरा होसी तिथि न कोयी बेली ॥13॥
सबर मंझ कमान ए सबर का नी होन ॥
सबर सन्दा बाणु, खालकु खता न करी ॥14॥
सायी सेव्यां गल गई मास रेहा देह ॥
तब लग साईं सेवसां जब लग होसी खेह ॥15॥
सांयी सन्दे नाव खे, दावनि पिरी चवन्नि ॥
रब्ब न भन्ने पोर्या, सन्दे फकीरन्न ॥16॥
साजनु कउ पतिया लिखो ऊपरि लिखो सलाम ॥
जब के साजन बीछुरे नैनी नींद हराम ॥17॥
साजन तुमरे दरसि कउ चाहत हो दिन रैन ॥
कोरा कागद हाथि दे मुखु स्युं करियहु बैन ॥18॥
साजन पतियां तउ लिखो जे किछु अंतरि होइ ॥
हम तुम जियरा एकु है देखनि कउं है दोइ ॥19॥
सुख डुखाहुं अगले जे गेहली धींगे ॥
सुखा लाय कथा थीवे जां भुख कबूल करे ॥20॥
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