Tuesday, 4 December 2018
अब तो निभायाँ सरेगी
अब तो निभायाँ सरेगी, बांह गहेकी लाज।।टेक।।
समरथ सरण तुम्हारी सइयां, सरब सुधारण काज॥
भवसागर संसार अपरबल, जामें तुम हो झयाज।
निरधारां आधार जगत गुरु तुम बिन होय अकाज॥
जुग जुग भीर हरी भगतन की, दीनी मोच्छ समाज।
मीरां सरण गही चरणन की, लाज रखो महाराज॥
पाठांतर
अबतो निभायाँ, बांह गह्याँरी लाज।।टेक।।
असरण सरण कह्याँ गिरधारी, पतित उधारत पाज।
भोसागर मझधार अधाराँ थें बिण घणो अकाज।
जुग जुग भीर हराँ भगतारीं, दीश्याँ मोच्छ नेवाज।
मीराँ सरण यहाँ चरणांरी, लाल रखाँ महाराज।।
समरथ सरण तुम्हारी सइयां, सरब सुधारण काज॥
भवसागर संसार अपरबल, जामें तुम हो झयाज।
निरधारां आधार जगत गुरु तुम बिन होय अकाज॥
जुग जुग भीर हरी भगतन की, दीनी मोच्छ समाज।
मीरां सरण गही चरणन की, लाज रखो महाराज॥
पाठांतर
अबतो निभायाँ, बांह गह्याँरी लाज।।टेक।।
असरण सरण कह्याँ गिरधारी, पतित उधारत पाज।
भोसागर मझधार अधाराँ थें बिण घणो अकाज।
जुग जुग भीर हराँ भगतारीं, दीश्याँ मोच्छ नेवाज।
मीराँ सरण यहाँ चरणांरी, लाल रखाँ महाराज।।
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)
No comments :
Post a Comment