Thursday, 13 December 2018
दरस बिन दूखण लागे नैन
दरस बिन दूखण लागे नैन।
जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन।
बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैन।
पाठांतर
दरस बिन दूखण लागे नैन ।।टेक।।
जब के तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपे, मीठे मीठै बैन।
बिरह-बिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरां के प्रभु कब रैं मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।।
जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन।
बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैन।
पाठांतर
दरस बिन दूखण लागे नैन ।।टेक।।
जब के तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपे, मीठे मीठै बैन।
बिरह-बिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरां के प्रभु कब रैं मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।।
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