Tuesday, 4 December 2018

तुकाराम के दोहे /साखिया

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1 . 

तुका बस्तर बिचारा क्यों करे रे । अंतर भगवा न होय।

भीतर मैला केंव मिटे रे । मरे उपर धोय ॥१॥


2. 
रामराम कहे रे मन । औरसुं नहीं काज ।

बहुत उतारे पार । आघे राख तुकाकी लाज ॥१॥


3. 
लोभी कें चित धन बैठे । कामीन चित्त काम ।

माताके चित पुत बैठें । तुकाके मन राम ॥१॥


4. 

तुका पंखिबहिरन मानुं । बोई जनावर बाग ।

असंतनकुं संत न मानूं । जे वर्मकुं दाग ॥१॥


5. 
तुका राम बहुत मिठा रे । भर राखूं शरीर ।

तनकी करूं नावरि । उतारूं पैल तीर ॥१॥


6. 
संतन पन्हयां लें खडा । राहूं ठाकुरद्वार ।

चलत पाछेंहुं फिरों । रज उडत लेऊं सीर ॥१॥


7. 
तुकाप्रभु बडो न मनूं न मानूं बडो । जिसपास बहु दाम ।

बलिहारि उस मुखकी । जीसेती निकसे राम ॥१॥


8. 
राम कहे सो मुख भलारे । खाये खीर खांड ।

हरिबिन मुखमो धूल परी रे । क्या जनि उस रांड ॥१॥


9. 
राम कहे सो मुख भला रे । बिन रामसें बीख ।

आव न जानूं रमते बेरों । जब काल लगावे सीख ॥१॥

10
कहे तुका में सवदा बेचूं । लेवेके तन हार ।

मिठा साधुसंतजन रे । मुरुखके सिर मार ॥१॥

11
तुका दास तिनका रे । रामभजन निरास ।

क्या बिचारे पंडित करो रे । हात पसारे आस ॥१॥

12.
तुका प्रीत रामसुं । तैसी मिठी राख ।

पतंग जाय दीप परे रे । करे तनकी खाक ॥१॥

13. 
कहे तुका जग भुला रे । कहया न मानत कोय ।

हात परे जब कालके । मारत फोरत डोय ॥१॥

14.
तुका सुरा नहि सबदका रे । जब कमाइ न होये ।

चोट साहे घनकि रे । हिरा नीबरे तोये ॥१॥

15.
तुका सुरा बहुत कहावे । लडत विरला कोये ।

एक पावे उंच पदवी । एक खौंसां जोये ॥१॥

16.
तुका माऱ्या पेटका । और न जाने कोये ।

जपता कछु रामनाम । हरिभगतनकी सोये ॥१॥

17.
काफर सोही आपण बुझे । आला दुनियां भर ।

कहे तुका तुम्हें सुनो रे भाई । हिरिदा जिन्होका कठोर ॥१॥

18.
भीस्त न पावे मालथी । पढीया लोक रिझाये ।

निचा जथें कमतरिण । सो ही सो फल खाये ॥१॥

19.
फल पाया तो खुस भया । किन्होसुं न करे बाद ।

बान न देखे मिरगा रे । चित्त मिलाया नाद ॥१॥

20. 
तुका दास रामका । मनमे एक हि भाव ।

तो न पालटू आव । ये हि तन जाव ॥१॥

21. 
तुका रामसुं चित बांध राखूं । तैसा आपनी हात ।

धेनु बछरा छोर जावे । प्रेम न छुटे सात ॥१॥


22. 
चितसुं चित जब मिले । तब तनु थंडा होये ।

तुका मिलनां जिन्होसुं । ऐसा विरला कोये ॥१॥


23.
चित मिले तो सब मिले । नहीं तो फुकट संग ।

पानी पाथर येक ही ठोर । कोरनभिगे अंग ॥१॥

24. 
तुका संगत तीन्हसें कहिये । जिनथें सुख दुनाये ।

दुर्जन तेरा मू काला । थीतो प्रेम घटाये ॥१॥

25. 
तुका मिलना तो भला । मनसुं मन मिल जाय ।

उपर उपर माटि घसनी । उनकि कोन बराई ॥१॥

26. 
तुका कुटुंब छोरे रे । लरके जोरों सिर गुंदाय ।

जबथे इच्छा नहीं मुई । तब तूं किया काय ॥१॥

27. 
तुका इच्छा मीटइ तो । काहा करे चट खाक ।

मथीया गोला डारदिया तो । नहीं मिले फेरन ताक ॥१॥

28. 
ब्रीद मेरे साइंयाके । तुका चलावे पास ।

सुरा सो हि लरे हमसें । छोरे तनकी आस ॥१॥

29. 
कहे तुका भला भया । हुं हुवा संतनका दास ।

क्या जानूं केते मरता । जो न मिटती मनकी आस ॥१॥


30.
तुका और मिठाई क्या करूं रे । पाले विकारपिंड ।

राम कहावे सो भली रुखी । माखन खांडखीर ॥१॥

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