Tuesday, 18 December 2018

माई री! मैं तो लियो गोविंदो मोल

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माई री! मैं तो लियो गोविंदो मोल।
कोई कहै छानै, कोई कहै छुपकै, लियो री बजंता ढोल।
कोई कहै मुहंघो, कोई कहै सुहंगो, लियो री तराजू तोल।
कोई कहै कारो, कोई कहै गोरो, लियो री अमोलिक मोल।
या ही कूं सब जाणत है, लियो री आँखी खोल।
मीरा कूं प्रभु दरसण दीज्‍यो, पूरब जनम को कोल।

पाठांतर
माई मैनें गोविंद लीन्हो मोल॥टेक॥
कोई कहे हलका कोई कहे भारी। लियो है तराजू तोल॥१॥
कोई कहे ससता कोई कहे महेंगा। कोई कहे अनमोल॥२॥
ब्रिंदाबनके जो कुंजगलीनमों। लायों है बजाकै ढोल॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। पुरब जनमके बोल॥४॥

पाठांतर
माई री म्हालियाँ गोबिन्दाँ मोल ।।टेक।। 
थें कह्याँ छाणो म्हां काँ चोड्‌डे, लियाँ बजन्ता ढोल।
थें कह्यां मुंहोधो म्हां सस्तो, लिया री तराजां तोल। 
तण वारां म्हां जीवण वारां, वरां अमोलक मोल। 
मीरां कूं प्रभु दसरण दीज्यां, पूरब जन्म को कोल।।

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