Friday, 21 December 2018
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥
जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छांड़ि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई॥
दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
जाके सिर है मोरपखा मेरो पति सोई।
तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥
छांड़ि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई॥
संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥
चुनरीके किये टूक ओढ़ लीन्हीं लोई।
मोती मूंगे उतार बनमाला पोई॥
अंसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेलि बोई।
अब तो बेल फैल गई आणंद फल होई॥
दूध की मथनियां बड़े प्रेम से बिलोई।
माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई॥
भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
पाठांतर
म्हराँ री गिरधर गोपाल दूसरआं णा कूयाँ।
दूसराँ णाँ कूयाँ साथाँ सकल लोक जूयाँ।।टेक।।
भाया छाँणयाँ, बन्धा छाँड्याँ सगाँ भूयां।
साधाँ ढिग बैछ बैठ, लोक लाज खूयाँ।
भगत देख्यां राजी ह्याँ, जगत देख्यां रूयाँ।
दूध मथ धृत काढ़ लयाँ डार दया छूयाँ।
राणा विषरो प्यालो भेज्याँ, पीय मगण हूयाँ।
मीरां री लगण लग्याँ होणा हो जो हूयाँ।।
म्हराँ री गिरधर गोपाल दूसरआं णा कूयाँ।
दूसराँ णाँ कूयाँ साथाँ सकल लोक जूयाँ।।टेक।।
भाया छाँणयाँ, बन्धा छाँड्याँ सगाँ भूयां।
साधाँ ढिग बैछ बैठ, लोक लाज खूयाँ।
भगत देख्यां राजी ह्याँ, जगत देख्यां रूयाँ।
दूध मथ धृत काढ़ लयाँ डार दया छूयाँ।
राणा विषरो प्यालो भेज्याँ, पीय मगण हूयाँ।
मीरां री लगण लग्याँ होणा हो जो हूयाँ।।
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