Friday, 21 December 2018

कोरे कोगज सा वज़ूद, औरत

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कोरे कोगज सा वज़ूद, औरत
(प्यार के नाम से औरत की इज्जत से खिलवाड़ करने वालो को पैगाम)

हर औरत की तरह मेरा वजूद भी एक कोरे कागज़ की तरह था
मुझे इन्तजार था के कोई आये
और इस कागज़ पे प्यार के रंग भर जाए
वफ़ा का इतर लगाये
कोई आये के मुझे एहतराम के मुकाम पे ले जाए
कोई आये के मुझे मुकम्मल वजूद से मिलवाए
कोई आये जो मेरी आँखे पढ़कर कागज़ पे नयी छाप बनाये
एक दिन कोई आया
जो मेरे चेहरे को चाँद आँखों को सितारा कहता था
वो जो मेरे साथ को ख़ुदा से अपनी नेकियों का बदला समझता था
वो जो मुझसे एहतराम और वफ़ा के दम भरता था
उसने कहा के वो मेरे कागज़ के वजूद पे रंग भरेगा
उसपर अपनी वफ़ा की दास्तान लिखेगा
मोहब्बत की इक नयी ग़ज़ल लिखेगा
अपना और मेरा सुनहरी कल लिखेगा

मगर इक रोज एक नयी आंधी उड़ने लगी
वो कागज को हवा में लहराने लगा
मानो मेरे वजूद का मजाक बनाने लगा
और अचानक ये कागज उसने हवा में छोड़ दिया
ये कभी जमीन तो कभी कीचड़ में मलियामेट हुआ
कभी लोगो के पैरो तले रौंदा जाने का डर हुआ
तो कभी टुकड़े टुकड़े होने का डर हुआ
फिर कुछ हिम्मत जुटाई मैंने
खुद अपनी ही पीठ थपथपाई
और कहा , के चल उठ
उठ के इस कागज को खुद लिख
लिख इस पर फरमान कोई
लिख इस पर हुक्म नया कोई
लिख इस दुआ के जिसने
इसे उड़ाया उसे भी मिले बेटी मुझ जैसी
लिख के उस बेटी के नसीब हो मुझ जैसे
लिख के वो रो रो कर पूछे के क्या भूल हुई उस से
लिख के औरत की इज्जत को मोहब्बत के धोखे में नंगा करने वाले को मिले सदियो सदी जहन्नुम की आग

ये कागज पे लिखा और अब सबको बताती हु, के डरो खुदा के ख़ौफ़ से,
डरो के गर तुम्हारे घर भी बेटी हई
डरो के उस बेटी को भी कोई तुम जैसा मिल गया तो
डरो के कही कोई औरत तुम्हारी वजह से रुसवा तो न हुई


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