Thursday, 13 December 2018

गुम हुआ, gum hua

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यादो की चादर पर, ख्यालो के फूल कितनी बार सजाये
कभी पानी तो कभी दर्पण में तुम्हारा अक्स देख मुस्काये

सर्द तनहा रातो में, कितने मद्धम दिये  जलाये
तुम्हारे इंतजार में कितने तूफ़ान उठाये
हर तेज हवा से बचाया , मगर दिया कभी बुझ नहीं पाया
कभी अंचल से संभाला तो कभी हथेलियो में लो को दबाया
मगर दिया कभी बुझ नहीं पाया
इ दिन यु ही अचानक एक मोइतज़ा हो गया
जिसका इन्तजार था वो द्वारे आ गया
वो आया तेज आंधी की तरह
आया यु के दिया हर बुझ गया
अँधेरा यु हुआ हावी के आँखे भी नाकाम हुई
आनेवाले शक्श अँधेरे में जाने कहा गुम हुआ

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