Thursday, 13 December 2018
रेशमी दुपट्टा reshmi dupatta
आज खूब गले मिल के रोई आज यु खुद से मिली
के जैसे बरसो बाद बिछुड़ी सहेली हो मिली
जब कोई ना था संग तो खुद में ढूंडा खुद का सहारा
आज कोई नहीं था मेरे और मेरे दरमियां
क्यों तन्हाइयो से लड़ती रहु
क्यों न खुद से दोस्ती करू
क्यों न वन की चिड़ियासी चहकु
क्यों न गिलगहरि सी उछलू
यु भी दुनिया में हर रिश्ता
छूट ही जाता है आहिस्ता आहिस्ता
क्यों न आज ही ढूंढ लू खुद में एक हमसफ़र पक्क
क्यों न आज ही लहराऊ हवा में रेशमी दुपट्टा
के जैसे बरसो बाद बिछुड़ी सहेली हो मिली
जब कोई ना था संग तो खुद में ढूंडा खुद का सहारा
आज कोई नहीं था मेरे और मेरे दरमियां
क्यों तन्हाइयो से लड़ती रहु
क्यों न खुद से दोस्ती करू
क्यों न वन की चिड़ियासी चहकु
क्यों न गिलगहरि सी उछलू
यु भी दुनिया में हर रिश्ता
छूट ही जाता है आहिस्ता आहिस्ता
क्यों न आज ही ढूंढ लू खुद में एक हमसफ़र पक्क
क्यों न आज ही लहराऊ हवा में रेशमी दुपट्टा
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