Sunday, 9 December 2018

कुबजा ने जादु डारा।

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कुबजा ने जादु डारा।
मोहे लीयो शाम हमारारे॥
दिन नहीं चैन रैन नहीं निद्रा।
तलपतरे जीव हमरारे॥ १॥
निरमल नीर जमुनाजीको छांड्यो।
जाय पिवे जल खारारे॥ २॥
इत गोकुल उत मथुरा नगरी।
छोड्यायो पिहु प्यारा॥ ३॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे।
जीवन प्रान हमारा॥ ४॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर।
बिरह समुदर सारा॥
कुबजा ने जादू डारारे॥५॥

पाठांतर
कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहै स्याम हमारा ।।टेक।।
झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा। 
निरमल जल जमुना को छाँड़ो, जाय पिया जल खारा। 
सीतल छाँय कदम की छोड़ी धूप सहा अति भारा। 
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, वाही प्राण पियारा।।

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