Sunday, 9 December 2018

कुण बांचे पाती

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कुण बांचे पाती, बिना प्रभु कुण बांचे पाती।
कागद ले ऊधोजी आयो, कहां रह्या साथी।
आवत जावत पांव घिस्या रे (वाला) अंखिया भई राती॥
कागद ले राधा वांचण बैठी, (वाला) भर आई छाती।
नैण नीरज में अम्ब बहे रे (बाला) गंगा बहि जाती॥
पाना ज्यूं पीली पड़ी रे (वाला) धान नहीं खाती।
हरि बिन जिवणो यूं जलै रे (वाला) ज्यूं दीपक संग बाती॥
मने भरोसो रामको रे (वाला) डूब तिर्‌यो हाथी।
दासि मीरा लाल गिरधर, सांकडारो साथी॥ 

पाठांतर
कुण बाँचै पाती, बिना प्रभु कुण बाँचे पाती। 
कागद ले ऊधौ आयो कहाँ रह्या साथी। 
आवत जावत पाँव घिस्यारे(बाला) अँखियाँ भई राती। 
कागद दे राधा बाँचण बैठी, भर आई छाती। 
नैण नीरज में अब बहे रे (बाला), गंगा बहि जाती। 
पाना ज्यूँ पीली पड़ी रे, (बाला), अन्न् नहिं खाती। 
हरि बिन जिवड़ो यूँ जलै रे(बाला), ज्यूँ दीपक सँग बाती। 
म्हने भरोसो राम को रे (बाला), डूबि तर्यो हाथी। 
दास मीराँ लाल गिरधर, सांकड़ारो साथी ।।

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