Friday, 21 December 2018

मैं गिरधर के घर जाऊँ

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मैं गिरधर के घर जाऊँ।
गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊँ।।
रैण पड़ै तबही उठ जाऊँ भोर भये उठिआऊँ।
रैन दिना वाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं ताहि रिझाऊँ।।
जो पहिरावै सोई पहिरूं जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उणकी प्रीति पुराणी उण बिन पल न रहाऊँ।
जहाँ बैठावें तितही बैठूं बेचै तो बिक जाऊँ।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार बार बलि जाऊँ।।

पाठांतर
में तो गिरधर के घर जाऊँ।।टेक।। 
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ। 
रैण पड़ै तब ही उछा जाऊँ भोर गये उछि आऊँ। 
रैणदिना वाके सँग खेलूं, ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊँ। 
जो पहिरावै होई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ। 
मेरी उणकी प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ। 
जहाँ बैठावैं तितही बैठै, बेचे तो बिक जाऊँ। 
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, बार बार बलि जाऊँ।।

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