Monday, 3 December 2018

दोहे शेख फरीद के Dohe sheikh farid 61-80

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टूबी मारनी गाखड़ी सधरां लख करेन ॥
जिनां दा मनु धाप्या सोयी मानक लडेन ॥61॥


तन समुन्द मनसा लहरु अरु तारू तरह अनेक ॥
ते बिरही क्युं जीवते जि आहे न करते एक ॥62॥


तन रहया मनु सड़िया पंजां नूं होयी ताकि ॥
ढेरी होयी भसम दी (ज्युं) बसती गुजराकि ॥63॥


तिना अति प्यार्यां कोइ न पुछे जाय ॥
खन्निअहु तिखी पुरसलात तै कन्नी न सुण्याइ ॥
फरीदा किड़ी पवन्दीए तूं खड़ा न आपु मुहाय॥64॥


दर भीड़ा घरु संगुड़ा गोर निमानी वासु ॥
देखु फरीदा जो थीया आड़वंजि करयासु ॥65॥


परीतम तुम मति जाण्या तुम बिछरत हम चैन ॥
दाधे बनि की लाकड़ी सुलघतु हूं दिन रैन ॥66॥


पलका सो पग झारती जो घर आवै पीउ ॥
अउर बधावा क्या करो मैं पल पल वारे जीउ ॥67॥


पलका सो पग झारती असूअन करत छिरकाउ ॥
भउहां ऊपरि पाउं धरि स्याम सलोने आउ ॥68॥


पिरी विसारनु ना करनु जे मूह भागेन ॥
फरीदा पिरी विसारे नाअते ब्या रवन कबुधी रवेनि ॥69॥


पीर विसारनि ब्या रवन कुबुधी चवेनि ॥
कंचन राम विसार कै मुठी धूड़ भओएन ॥70॥


फरीदा उचा न कर सदु रब दिलां दियां जाणदा ॥
जु तुध विच कलब सो मंझाहू दूर करि ॥71॥


फरीदा उथां टिकीऐ जिथे वसन अन्न्हे ॥
ना को सानूं जाने बुझे ना सानूं मन्ने ॥72॥


फरीदा असां केरी भई सुरीत ॥
जाऊं प्रीतम की गली कि जाऊं मसीत ॥73॥


फरीदा अकै त सिकन सिकु, अकै त पुछि सिकन्द्यां ॥
तिनां पिछे न लुक, जो सिकन सार न जाणनी ॥74॥


फरीदा अकै त लोड़ मुकद्दमी, अकै त अल्लहु लोड़ ॥
दो धरि बेड़ीं न लत्त धरि, वंझह वखत बोड़ि ॥75॥


फरीदा अति रंगड़े विगुचयो वंञि पुछा मंजिठ ॥
टके तोल बिकांवदी सु गोली रुलन्दी दिट्ठ ॥76॥


फरीदा अज कि कल कि चहु दिनी ओड़क दिनी दसीं ॥
एस सुहावड़े देसड़े ना होवहगे असीं ॥77॥


फरीदा अन्दर तै जे मामले बाहर क्या सीगार ॥
पाज तिथाऊ उघड़ै जिथे मिले कंधार ॥78॥


फरीदा अन्दर भरिया सांमली बाहरि की संगयार ॥
पाज तिधाईं उघड़ै जिथे मिलन्ह कंधार ॥79॥


फरीदा आह हिकड़ा अते हुन भि थीसी हिक ॥
ओपयी टन्ना न करे, तेही आइअसु सिक ॥80॥


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