Sunday, 17 March 2019
दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई फ़रमायेंगे क्या dost gamkhavaari mei meri
दोस्त ग़मख्वारी में मेरी सअ़ई फ़रमायेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक नाख़ुन न बढ़ आयेंगे क्या
बे-नियाज़ी हद से गुज़री, बन्दा-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फ़रमायेंगे, 'क्या?'
हज़रत-ए-नासेह गर आएं, दीदा-ओ-दिल फ़र्श-ए-राह
कोई मुझ को ये तो समझा दो कि समझायेंगे क्या
आज वां तेग़ो-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मैं
उज़्र मेरा क़त्ल करने में वो अब लायेंगे क्या
गर किया नासेह ने हम को क़ैद अच्छा! यूं सही
ये जुनून-ए-इश्क़ के अन्दाज़ छुट जायेंगे क्या
ख़ाना-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दां से घबरायेंगे क्या
है अब इस माअ़मूरा में, क़हते-ग़मे-उल्फ़त 'असद'
हमने ये माना कि दिल्ली में रहें, खायेंगे क्या
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