Sunday, 17 March 2019
हवस को है निशाते-कार क्या क्या havas ko hai nishaate kaar kya kya
हवस को है निशाते-कार क्या क्या
न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या
तजाहुल-पेशगी से मुद्दआ क्या
कहां तक ऐ सरापा-नाज़ क्या-क्या
नवाज़िश-हाए-बेजा देखता हूं
शिकायत-हाए-रंगीं का गिला क्या
निगाह-ए-बेमुहाबा चाहता हूं
तग़ाफ़ुल-हाए-तमकीं-आज़मा क्या
फ़रोग़-ए-शोला-ए-ख़स यक-नफ़स है
हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या
नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बेखुदी है
तग़ाफ़ुल-हाए-साक़ी का गिला क्या
दिमाग़-ए-इत्र-ए-पैराहन नहीं है
ग़म-ए-आवारगी-हाए-सबा क्या
दिल-ए-हर-क़तरा है साज़-ए-अनल-बहर
हम उस के हैं हमारा पूछना क्या
मुहाबा क्या है मैं ज़ामिन, इधर देख
शहीदान-ए-निगह का ख़ूं बहा क्या
सुन ऐ ग़ारतगर-ए-जिन्स-ए-वफ़ा सुन
शिकस्त-ए-क़ीमत-ए-दिल की सदा क्या
किया किस ने ज़िगरदारी का दावा
शकेब-ए-ख़ातिर-ए-आशिक़ भला क्या
ये क़ातिल वादा-ए-सब्र-आज़मा क्यूं
ये काफ़िर फ़ित्ना-ए-ताक़तरुबा क्या
बला-ए-जां है ग़ालिब उस की हर बात
इबारत क्या, इशारत क्या, अदा क्या
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