Saturday, 16 March 2019
जुज़ क़ैस और कोई न आया बरूए-कार judge kais aur kpi na aayaa
जुज़ क़ैस और कोई न आया बरूए-कार
सहरा मगर बतंगी-ए-चश्मे-हसूद था
आशुफ़्तगी ने नक़्शे-सवैदा किया दुरुस्त
ज़ाहिर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था
था ख़्वाब में ख़याल को तुझसे मुआमला
जब आँख खुल गई न ज़ियां था न सूद था
लेता हूँ मकतबे-ग़मे-दिल में सबक़ हनूज़
लेकिन यही कि 'रफ़्त'-'गया', और 'बूद'-था
ढाँपा कफ़न ने दाग़े-अ़यूबे-बरहनगी
मैं वर्ना हर लिबास में नंगे-वजूद था
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन 'असद'
सरगश्ता-ए ख़ुमारे-रुसूम-ओ-क़यूद था
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