Saturday, 13 April 2019
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे aaina kyu na du ki tamasha kahe jise
आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ-सा कहें जिसे
हसरत ने ला रखा तेरी बज़्म-ए-ख़याल में
गुलदस्ता-ए-निगाह सुवैदा कहें जिसे
फूँका है किसने गोश-ए-मुहब्बत में ऐ ख़ुदा
अफ़सून-ए-इन्तज़ार तमन्ना कहें जिसे
सर पर हुजूम-ए-दर्द-ए-ग़रीबी से डालिये
वो एक मुश्त-ए-ख़ाक कि सहरा कहें जिसे
है चश्म-ए-तर में हसरत-ए-दीदार से निहां
शौक़-ए-अ़ना-गुसेख़्ता दरिया कहें जिसे
दरकार है शगुफ़्तन-ए-गुल हाये-ऐश को
सुबह-ए-बहार पम्बा-ए-मीना कहें जिसे
"गा़लिब" बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे
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