Thursday, 4 April 2019
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नही dwangi pe josh pe junnar bhi
दीवानगी से दोश पे ज़ुन्नार भी नहीं
यानी हमारे जैब में इक तार भी नहीं
दिल को नियाज़े-हसरते-दीदार कर चुके
देखा तो हममें ताक़ते-दीदार भी नही
मिलना तेरा अगर नहीं आसां तो सह्ल है
दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं
बे-इश्क़ उम्र कट नहीं सकती है और यां
ताक़त बक़द्रे-लज़्ज़ते-आज़ार भी नहीं
शोरीदगी के हाथ से है सर वबाले-दोश
सहरा में ऐ ख़ुदा कोई दीवार भी नहीं
गुंजाइशे-अ़दावते-अग़यार इक तरफ़
यां दिल में ज़ोफ़ से हवसे-यार भी नहीं
डर नाला-हाए-ज़ार से मेरे ख़ुदा को मान
आख़िर नवाए-मुर्ग़े-गिरफ़तार भी नहीं
दिल में है यार की सफ़े-मिज़गां से रूकशी
हालाँकि ताक़ते-ख़लिशे-ख़ार भी नहीं
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
देखा ‘असद’ को ख़ल्वत-ओ-जल्वत में बारहा
दीवाना गर नहीं है तो हुशियार भी नहीं
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