Friday, 5 April 2019
हुजूम-ए-ग़म से, यां तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है huzum ae gam se yaa tak
हुजूम-ए-ग़म से, यां तक सर-निगूनी मुझ को हासिल है
कि तार-ए-दामन-ओ-तार-ए-नज़र में फ़र्क़ मुश्किल है
रफ़ू-ए-ज़ख़्म से, मतलब है लज़्ज़त ज़ख़्म-ए-सोज़न की
समझियो मत कि पास-ए-दर्द से दीवाना ग़ाफ़िल है
वह गुल जिस गुलसितां में जल्वा-फ़रमाई करे, ग़ालिब
चटकना ग़ुंचा-ए-गुल का सदा-ए-ख़न्दा-ए-दिल है
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