Thursday, 4 April 2019
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किये us bazm mei mujhe nahi banti
उस बज़्म में मुझे नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगर्चे इशारे हुआ किये
दिल ही तो है सियासत-ए-दर्बाँ से डर गया
मैं और जाऊँ दर से तेरे बिन सदा किये
रखता फिरूँ हूँ ख़ीर्क़ा-ओ-सज्जादा रहन-ए-मय
मुद्दत हुई है दावत-ए-आब-ओ-हवा किये
बेसर्फ़ा ही गुज़रती है, हो गर्चे उम्र-ए-ख़िज़्र
हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किये
मक़दूर हो तो ख़ाक से पूछूँ के अए लईम
तूने वो गंज हाये गिराँमाया क्या किये
किस रोज़ तोहमतें न तराशा किये अदू
किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किये
सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसे बग़ैर इल्तिजा किये
ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं
भूले से उस ने सैकड़ों वादे-वफ़ा किये
"ग़ालिब" तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या
माना कि तुम कहा किये और वो सुना किये
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)
No comments :
Post a Comment