Thursday, 4 April 2019
एक जा हरफ़-ए-वफ़ा लिक्खा था सो भी मिट गया ek jaa haraf ae wafaa likha tha vo
एक जा हरफ़-ए-वफ़ा लिक्खा था सो भी मिट गया
ज़ाहिरन काग़ज़ तेरे ख़त का ग़लत-बरदार है
जी जले ज़ौक़-ए-फ़ना की ना-तमामी पर न क्यूं
हम नहीं जलते, नफ़स हर-चन्द आतिश-बार है
आग से पानी में बुझते वक़्त उठती है सदा
हर कोई दर-मांदगी में नाले से ना-चार है
है वही बद-मस्ती-ए-हर-ज़र्रा का ख़ुद उज़र-ख़्वाह
जिस के जलवे से ज़मीं ता आसमां सरशार है
मुझ से मत कह, "तू हमें कहता था अपनी ज़िन्दगी"
ज़िन्दगी से भी मेरा जी इन दिनों बे-ज़ार है
आंख की तस्वीर सर-नामे पे खेंची है, कि ता
तुझ पे खुल जावे कि उस को हसरत-ए दीदार है
Subscribe to:
Post Comments
(
Atom
)
No comments :
Post a Comment