Saturday, 6 April 2019
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की jis jakhm ki ho sakti ho
जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की
लिख दीजियो, या रब उसे ! क़िस्मत में अ़दू की
अच्छा है सर-अनगुश्त-ए-हिनाई का तसव्वुर
दिल में नज़र आती तो है, इक बूंद लहू की
क्यों डरते हो उ़शशाक़ की बे-हौसलगी से
यां तो कोई सुनता नहीं फ़रियाद किसू की
दश्ने ने कभी मुंह न लगाया हो जिगर को
ख़ंज़र ने कभी बात न पूछी हो गुलू की
सद हैफ़ ! वह ना-काम, कि इक उ़मर से ग़ालिब
हसरत में रहे एक बुत-ए-अ़रबदा-जू की
गो ज़िंदगी-ए-ज़ाहिद-ए-बे-चारा अ़बस है
इतना है कि रहती तो है तदबीर वुज़ू की
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