Friday, 5 April 2019
शिकवे के नाम से बेमेहर ख़फ़ा होता है shikvd ke naam se bemehar khafaa
शिकवे के नाम से बेमेहर ख़फ़ा होता है
ये भी मत कह, कि जो कहिये, तो गिला होता है
पुर हूँ मैं शिकवा से यूँ, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िये, फिर देखिये क्या होता है
गो समझता नहीं पर हुस्ने-तलाफ़ी देखो!
शिकवा-ए-ज़ौर से सरगर्म-ए-जफ़ा होता है
इश्क़ की राह में है, चर्ख़-ए-मकौकब की वो चाल
सुस्त-रौ जैसे कोई आबला-पा होता है
क्यूँ न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद कि हम
आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता है
ख़ूद था, पहले से होते जो हम अपने बदख़्वाह
कि भला चाहते हैं, और बुरा होता है
नाला जाता था, परे अ़र्श से मेरा, और अब
लब तक आता है जो ऐसा ही रसा होता है
ख़ामा मेरा, कि वह है बारबुद-ए-बज़्म-ए-सुख़न
शाह की मदह में यूं नग़्मा-सरा होता है
ऐ शहनशाह-ए-कवाकिब सिपह-ओ-मिहर-`अलम
तेरे इकराम का हक़ किस से अदा होता है
सात इक़्लीम का हासिल जो फ़राहम कीजे
तो वह लश्कर का तेरे, नाल-बहा होता है
हर महीने में जो यह बदर से होता है हिलाल
आस्तां पर तेरे यह नासिया-सा होता है
मैं जो गुस्ताख़ हूं आईना-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी[29] में
यह भी तेरा ही करम ज़ौक़-फ़िज़ा[30] होता है
रखियो 'ग़ालिब' मुझे इस तल्ख़-नवाई[31] से मु`आफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा[32] होता है
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