Tuesday, 2 April 2019
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त aamad ae khat se hua hai
आमद-ए-ख़त से हुआ है सर्द जो बाज़ार-ए-दोस्त
दूद-ए-शम-ए-कुश्ता था शायद ख़त-ए-रुख़्सार-ए-दोस्त
ऐ दिले-ना-आ़क़बत-अंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त
ख़ाना-वीरां-साज़ी-ए-हैरत-तमाशा कीजिये
सूरत-ए-नक़्शे-क़दम हूँ रफ़्ता-ए-रफ़्तार-ए-दोस्त
इश्क़ में बेदाद-ए-रश्क़-ए-ग़ैर ने मारा मुझे
कुश्ता-ए-दुश्मन हूँ आख़िर, गर्चे था बीमार-ए-दोस्त
चश्म-ए-मा-रौशन कि उस बेदर्द का दिल शाद है
दीदा-ए-पुरख़ूँ हमारा साग़र-ए-सरशार-ए-दोस्त
ग़ैर यूं करता है मेरी पुरसिश उस के हिज़्र में
बे-तकल्लुफ़ दोस्त हो जैसे कोई ग़मख़्वार-ए-दोस्त
ताकि मैं जानूं कि है उस की रसाई वां तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोस्त
जबकि मैं करता हूं अपना शिकवा-ए-ज़ोफ़-ए-दिमाग़
सर करे है वह हदीस-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बर-बार-ए-दोस्त
चुपके-चुपके मुझ को रोते देख पाता है अगर
हंस के करता है बयाने-शोख़ी-ए-गुफ़्तारे-दोस्त
मेहरबानी हाए-दुश्मन की शिकायत कीजिये
या बयां कीजे, सिपासे-लज़्ज़ते-आज़ारे-दोस्त
यह ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसन्द आती है आप
है रदीफ़-ए-शेर में 'ग़ालिब' ज़बस तकरार-ए-दोस्त
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