Wednesday, 3 April 2019

न गुल-ए-नग़्मा हूँ, न परदा-ए-साज़ na gul ae nagma hu na parda ae saaz

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न गुल-ए-नग़्मा हूँ, न परदा-ए-साज़
मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़

तू, और आराइश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं, और अंदेशा-हाए-दूरो-दराज़

लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली
हम हैं, और राज़ हाए-सीना-ए-गुदाज़

हूँ गिरफ़्तारे उल्फ़त-ए-सैयाद
वरना बाक़ी है ताक़ते परवाज़

वो भी दिन हो कि उस सितमगर से
नाज़ खींचूं बजाय हसरते-नाज़

नहीं दिल में तेरे वो क़तरा-ए-ख़ूं
जिस से मिज़गां हुई न हो गुलबाज़

मुझको पूछा तो कुछ ग़ज़ब न हुआ
मैं गरीब और तू ग़रीब-नवाज़

असदुल्लाह ख़ां तमाम हुआ
ऐ दरेग़ा वह रिंद-ए-शाहिदबाज़


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