Monday, 12 June 2017
खिलौना बना दिया
कभी गले से लगा लिया
कभी हाथ छुड़ा लिया
हमसफ़र बनकर जो आया जिंदगी मै
उसने मुझे खिलौना बना दिया
हुए बहुत से वादे
गुजारी संग कितनी रातें
मगर जब चाहा तब मुझे
अनजान आग मैं जला दिया
तड़पी बहुत मैं
दर्द भी हुआ बहुत
शयद उसे भी दर्द तो हुआ होगा
आंख से क़तरा पानी उसके भी गिरा तो होगा
बात चार दिन की ना थी
बात तो सात जनम की थी
जाने किस रौशनी मैं
उसने अपनी आंको से मुझको निचे गिरा दिया
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